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खाद्य संकट को देखते हुए क्या भारत अगला कृषि निर्यातक (Krishi Niryatak) बन सकता है? पता करें

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Can India Become The Next Agro-Exporter As Food Crisis Looms. क्या भारत अगला कृषि निर्यातक (Krishi Niryatak) बन सकता है 2022 मे?
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क्या भारत अगला कृषि निर्यातक (Krishi Niryatak) बन सकता है?

दुनिया की आबादी 2050 तक करीब 10 अरब पहुंच जाएगी। अगर आप 2013 की आर्थिक वृद्धि के मुकाबले 50 प्रतिशत की मामूली आर्थिक वृद्धि की भी उम्मीद करते हैं, तो अनाज की मांग बढ़ेगी। किसी भी निम्न और मध्यम आय वाले देश में अगर आय बढ़ेगी, तो वह सीधे उनके खाने की आदत में बदलाव की रफ्तार को तेज करेगी। इससे लोग अनाज की तुलना में फलों, सब्जियों और मांस का अधिक सेवन कर सकते हैं। इसका सीधा मतलब होगा प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव डालते हुए उसके अनुसार कृषि उत्पादन में बदलाव लाना।

2022 में कई देश दशकों के सुधारों के बावजूद खाद्य संकट का सामना कर रहे हैं। इस खाद्य संकट के कारणों में संघर्ष, सामाजिक-आर्थिक कारक, बढ़ी हुई प्राकृतिक आपदाएं, जलवायु परिवर्तन और परिवर्तित कीट जैसे कारण शामिल हैं।

इसके अलावा, यूक्रेन में युद्ध ने वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए जोखिम बढ़ा दिया। इससे खाद्य कीमतों में वृद्धि हुई। आने वाले दिनों में खाद्य कीमतों में और वृद्धि की आशंका है, जिससे लाखों लोगों के सामने खाने का गंभीर संकट पैदा हो सकता है। हालांकि, वैश्विक खाद्य आपूर्ति सकारात्मक बनी हुई है, लेकिन उच्च उत्पादन लागत, लाने-लेजाने का खर्च और युद्ध से व्यापार में आ रही बाधा की वजह से खाद्य कीमतों की तेज वृद्धि ने आयात बिलों में बढ़ोत्तरी हुई है। इस तरह की वृद्धि गरीब और विकासशील देशों को प्रभावित करती है, क्योंकि वे घरेलू मांग को पूरा करने के लिए विदेशी अनाजों पर निर्भर हैं।

विश्व बैंक के कमोडिटी मूल्य के आंकड़ों के अनुसार, मई 2022 के कृषि मूल्य इंडेक्‍स में जनवरी 2021 की तुलना में 42 प्रतिशत वृद्धि हुई। इस दौरान मक्का और गेहूं की कीमतों में क्रमशः 55 प्रतिशत और 91 प्रतिशत की वृद्धि हुई, हालांकि चावल की कीमतों में 12 प्रतिशत की गिरावट आई।

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भारत का निर्यात कोविड की कठिनाइयों से उपजे संकट के बाद भी 20 प्रतिशत बढ़कर 50.21 अरब डॉलर पहुंच गया। यह वृद्धि भारत के लिए अब तक की सबसे अधिक वृद्धि थी। दुनिया में कमोडिटी की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे में हमारे लिए आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े मुद्दों और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण इस मौके को भुनाने के लिए एक सुनहरा अवसर है।

भारत के पास अब दुनिया का अगला कृषि निर्यातक (Krishi Niryatak) बनने का शानदार मौका है। यह प्याज, फल, दालें, डेयरी उत्पाद, चावल, मांस, अनाज, गेहूं, नट्स, मादक पेय, अनाज, काजू, सब्जियां आदि निर्यात करता है। 2021-22 में कृषि निर्यात में चावल ने 17 प्रतिशत से अधिक का योगदान दिया।

चावल का निर्यात 9.35 प्रतिशत बढ़कर 9.65 अरब डॉलर हो गया। हालांकि, हमने दो साल पहले तक गेहूं का निर्यात नहीं किया था, लेकिन 2021-22 में हमारा गेहूं निर्यात 2020-21 में 567 मिलियन डॉलर से बढ़कर 2.2 बिलियन डॉलर हो गया। हमने पिछले साल 70 लाख टन गेहूं विदेश भेजा था, जबकि दो साल में 20 लाख टन ही भेजा था।

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स्रोत: IBEF निर्यात रुझान

इस वृद्धि का मतलब यह माना जाए कि, भारत अगला कृषि निर्यातक (Krishi Niryatak) बन सकता है?

चीन अपनी खाद्य मांगों को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर है। इसके विपरीत भारत इस मामले में आत्मनिर्भर है। खाद्य तेलों और कुछ दालों के आयात को छोड़कर, हम घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त रूप से अनाज उपजाते हैं। इस बात का प्रमाण महामारी के दौरान बिना किसी आपूर्ति की समस्या के सरकार द्वारा करोड़ों लोगों को मुफ्त भोजन दिया जाना है।

अपने खाद्य आयात के लिए रूस और यूक्रेन पर निर्भर देश को अचानक से कमी का सामना करना पड़ रहा है। उनकी नजर अब अधिशेष कृषि उत्पादन वाले देशों पर है। ऐसे में भारत उनको सबसे सही लगा, क्योंकि भारत में गेहूं, मक्का, चीनी, और अन्य उत्पाद अधिशेष मात्रा में उपलब्ध हैं।

उदाहरण के लिए, इंडोनेशिया और इक्वाडोर केले के सबसे बड़े निर्यातक हैं। लेकिन, आपूर्ति समस्या के कारण उनका निर्यात काफी प्रभावित हुआ। इसका फायदा भारत को मिला। भारत ने केले का निर्यात किया और साल-दर-साल 100 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। साथ ही भारत इस मामले में मध्य पूर्व के बाजारों में सबसे प्रमुख खिलाड़ियों में से एक बन गया। हमने एक ऐसी कमोडिटी में कदम रखा, जिसका हमने पहले कभी भी निर्यात नहीं किया था।

भारत एक और मौके का फायदा उठा सकता है। वह है अंडे और मुर्गी का निर्यात। मध्य पूर्व अंडे का आयात तो करता है, लेकिन अभी तक उन देशों ने भारत से आयात नहीं किया है। हमारे पोल्ट्री उत्पादों का निर्यात 2021-22 में बढ़कर 71 मिलियन डॉलर हो गया, जो 2020-21 में 58 मिलियन डॉलर था।

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भारत के पास उन उत्पादों को निर्यात करने का अवसर है, जिन्हें उसने पहले विदेश नहीं भेजा है। सवाल है कि खाद्य संकट की स्थिति में इस मौके का अधिक से अधिक फायदा उठाने के लिए भारत को क्या करना चाहिए?

भारत को एक ब्रांड बनाएं: विश्व का निर्यातक बनने के लिए पहला कदम ब्रांड इंडिया बनाना है। हम कई वस्तुओं का निर्यात करते हैं; हालांकि, वे भारतीय हैं, इसका कोई संकेत नहीं मिलता है। उदाहरण के लिए, हमने कैलिफोर्निया बादाम और वाशिंगटन सेब के बारे में सुना है। इसी तरह बासमती चावल से लेकर हल्दी जैसे भारतीय उत्पादों की वैश्विक पहचान होनी चाहिए। इसलिए, सरकार और निजी उत्पादकों को प्रत्येक श्रेणी के लिए ब्रांड बनाना चाहिए और उन्हें बढ़ावा देना चाहिए।

बुनियादी ढांचे और आपूर्ति क्षमता में सुधार: युद्ध ने वैसे उत्पादों के निर्यात के लिए दरवाजे खोले हैं, जिनके निर्यात पर पहले रोक थी। युद्ध की समाप्ति के बाद भी उन उत्पादों का निर्यात जारी रखने के लिए हमें कुछ जरूरी उपाय करने होंगे। जैसे, हमें अपनी बंदरगाह संरचना में सुधार करना चाहिए, बेहतर भंडारण सुविधाएं होनी चाहिए और लागत का प्रबंधन करना चाहिए। इसके अलावा, हमें बदलाव पर जोर देना चाहिए। साथ ही ब्रांड भारत का दुनिया भर में बढ़-चढ़कर प्रचार-प्रसार करना चाहिए।

सरकार कैसे कर रही है इस तरह की पहल का समर्थन?

सरकार कृषि उत्पादकता में सुधार पर ध्यान दे रही है। उसने कृषि की मदद के लिए कई पहल की हैं। नतीजतन, पिछले कुछ वर्षों में, सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी में गिरावट आई है। हालांकि, इन परिवर्तनों और फोकस का फायदा मिला है। सकल घरेलू उत्पाद में कृषि योगदान 20 प्रतिशत से अधिक बढ़ गया है।

सरकार की पहल:

  • फसल विविधीकरण, जहां सरकार चावल, गेहूं और मक्का के अलावा दूसरी फसलों के उत्पादन को प्रोत्साहित करना चाहती है।
  • भारत में निर्मित या उत्पादित खाद्य उत्पादों के लिए ई-कॉमर्स और फिजीकल कारोबार में सरकारी मंजूरी से 100% FDI की अनुमति। 
  • प्रधान मंत्री किसान संपदा योजना से खेतों से खुदरा आउटलेट तक कुशल आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन के साथ आधुनिक बुनियादी ढांचा तैयार किया जाएगा । इस योजना में अन्य उप-योजनाएं शामिल हैं, जैसे एकीकृत शीत श्रृंखला और मूल्य संवर्धन अवसंरचना, खाद्य प्रसंस्करण संरक्षण क्षमताओं का निर्माण या विस्तार, कृषि-प्रसंस्करण समूहों का बुनियादी ढांचा और ऑपरेशन ग्रीन्स। 
  • निवेश बंधु, एक समर्पित निवेशकों का मंच है, जो व्यापार करना आसान बनाता है। साथ ही एक ही मंच पर कारोबार को प्रोत्साहन और नीतियों के बारे में जानकारी भी देता है।
  • 41 मेगा फूड पार्क, 350 कोल्ड चेन परियोजनाओं और 62 कृषि-प्रसंस्करण क्लस्टरों के माध्यम से बुनियादी ढांचे का समर्थन।  
  • पशुपालन अवसंरचना विकास कोष डेयरी और मांस प्रसंस्करण में निवेश की सुविधा देता है। साथ ही पशु चारा संयंत्र भी स्थापित करने में मदद करता है। सरकार ऐसे काम के लिए लोन लेने वालों को ब्याज में तीन प्रतिशत की छूट और कुल लोन रकम का 25 प्रतिशत क्रेडिट गारंटी देती है। 

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क्या इसका मतलब यह है कि भारत को कृषि निर्यातक (Krishi Niryatak) बनने में कोई बाधा नहीं है?

नहीं, कई मुद्दे हो सकते हैं। उनमें से एक भोजन की घरेलू मांग में वृद्धि हो सकती है। इसलिए भारत को घरेलू खाद्य मांगों को पूरा करने के बाद उपलब्ध अधिशेष की जांच करनी होगी।

एक और बाधा असंगत आपूर्ति हो सकती है – देश अपनी लगातार आपूर्ति के कारण यूक्रेन और रूस से आयात करते हैं।

क्या भारत अपनी खाद्य मांगों को लगातार पूरा कर सकता है? ये कुछ ऐसी बातें हैं, जिन पर हमें गंभीरता से सोचने की जरूरत है। इन बातों के संदर्भ में हमें देखना होगा कि सरकार संकट में अवसर का कैसे लाभ उठाती है।

Read More: India Energy Crises: Feeling powerless, yet again

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